ज़रा उन्हें भी तो पता चले....



आज जब मौका मिला ही है, तो कह ही लेने दो यार ।

कि ज़रा उन्हें भी तो पता चले ।

कि 

हमने भी मन ही मन चाहा था उन्हें ।

ये जानते हुए भी की उनके कई आशिक थे, उस कतार में ।

हमें तो मौका ही नहीं मिलता बस उनकी नज़र का इक छोटा सा कोना पाने के लिए ।


ज़रा उन्हें भी पता चले कि

वो हमने ही नज़रें फेर दी थीं,

वरना उस आँच में जलना हमें भी आता था,

जिसमें वो आशिकों की कतारें झुलस गई ।


चलिए एकतरफा ही सही, पर लोगों ने इसे इश्क़ नाम से ही नवाज़ा । 

और हमने भी इनकार नहीं किया।

हाँ बस हम उनसे कह नहीं पाए,

वो एक अलग बात थी।


फिर एक दिन मिल गयी 

यूँ ही 

इत्तेफ़ाक़ से नज़र,

ब आप भी जानते हैं कि,

हानी वही है, 

बदला कुछ नहीं है,

बातें अब शुरू हो गयी हैं । 

पर,

पर 

हमसे अब भी कुछ कहा नहीं गया ।


पर अब जब कह ही रहा हूँ तो,

ज़रा उन्हें भी पता चले कि


रातों में जाग कर भी खुली आँखों से उनका सपना देखा है हमनें ।


सुबह उस आधी नींद में भी एक आँख खोलकर सिर्फ उनके ही मैसेज का दीदार किया है ।

 और,

  और 

हाँ बात थोड़ी सी पुरानी सी लगेगी पर,

रेडियो पर वो हमारा वाला गाना जब बजा है ना?

तो उनकी याद आई ही है ।


बहुत कुछ है,

जो वो जान नहीं पाए, और हमसे कहा भी नहीं गया ।

ज तक था मन में 

 पर 

 अब हमसे रहा भी नहीं गया ।



अब जब लिख ही रहा हूँ 

 तो 

 उन्हें ज़रा ये भी पता चल ही जाए कि


किसी पतझड़ की शाम को

उनके हाथ को थामने का अरमान मन में रह गया था।


कि किसी सांवली सी रात में उनकी आँखों में उतरने का ख्वाब अधूरा रह गया था ।


या फिर उन आलसी दोपहरों को इस शहर का चप्पा चप्पा नापने की ख्वाहिश रह गई थी ।


कि रह गयी थी वो आस , जिसमे समंदर किनारे की उस रेत पर अपने पैरों के निशान छोड़ने थे, 

 एक साथ ।


उन्हें पता तो चला होगा ना!?

 

 

 

By Pritam singh. 







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